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Another1 Religion of BHARAT: The Power of-11
Indigo
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Another1 Religion of BHARAT: The Power of-11
By None
Current price: $1.36


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Size: Kobo eBook
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"नाम और जगह बदले हुए हैं| यदि नाम आपसे मेल भी खाते हैं तो भी आप यह जानते हैं कि कहानी आपकी नहीं हैं| कृपया किसी बात व घटना को अन्यथा ना लें तथा देश व समाज़ की बेहतरी के लिए अपने कर्तब्यों का सार्थक रूप से निर्वहन करें|
(1) जब मेरी उम्र कोई बारह साल रही होगी, उस टाइम मैं अक्सर अपने आस पड़ोस के लोगों से व अपने घर में एक बंदे के बारे में सुना करती थी| वह मुस्लिम था| दो चार बार मैंने उसे आते-जाते देखा भी था| दिखने में हट्टा कट्टा व खूबसूरत बंदा था| उस वक़्त उसकी उम्र कोई छब्बिस अठ्ठाइस के बीच रही होगी| वह मेरी बस्ती का तो नहीं था मगर उसे आसपास के लोग जानते थे| वह सिर झुका कर चलता था| तीन साल पहले जब हिन्दू-मुस्लिम मुझे बहुत सुनाई देने लगा, तब उसका ख़याल आया तो मैंने उसके बारे में सर्च की| तो पता चला कि वह बलात्कारियों से बहुत नफ़रत करता था| हालांकि अब वह कहाँ है, कोई नहीं जानता| वह बलात्कारियों को पकड़ता और अपने तरह से सज़ा देता|
(2) कुछ साल पहले मेरा एक कज़िन जब कॉलेज़ जाता था तो उसका एक फ्रेंड ग्रुप था, जिसमे सात लोग थे तथा कई धर्म व जाति के लोग थे| उसमे एक मुस्लिम लड़का था| इस टीम में एक लड़की भी थी| इस टीम की आपसी समझ, भिन्न जाति व भिन्न धर्म तथा कॉलेज़ के समय में भी समाज़ के लिए कई काम करना मुझे बहुत प्रभावित करता था| बहुत सकारात्मक उर्जा इस टीम से आती थी|
फिर मेरा कज़िन डेल्ही चला गया| कमाल की बात यह थी कि डेल्ही में भी उसके तीन ख़ास मित्र हुए जो अलग अलग कम्यूनिटी से थे| जब उसने एक बार डेल्ही वाले मित्रों को कॉलेज़ के मित्रों से मिलवाया, तो वह पार्टी मुझे कभी नहीं भूल सकती|
(3) इसी तरह मैं एक बार पब्लिक ट्रांसपोर्ट से मार्केट गई| दिन था पंद्रह अगस्त का| वापसी में भीड़ की वजह से मुझे कोई वाहन भी नहीं मिला और मैं करीब आधा किलो मीटर लम्बी भीड़ में फंस गई| यह देश के लिए आम जनों की रैली थी| खैर मैं किस तरह उस भीड़ में फंसी थी और क्या तकलीफ़ व कितनी भावनाएं आहत हुई थीं, यह चंद शब्दों में बयान करना मुमकिन नहीं| मगर एक भाई ने मुझसे पाँच गज दूर चलते हुए, रास्ता बनाते हुए वहाँ से मुझे बाहर निकाला| कहते हैं कि जिसके ऊपरसे मुसीबत गुज़रती है, वही जानता है| मेरे लिए उस वक़्त उस भीड़ से बाहर आना किसी बड़ी मुसीबत से बाहर आने जैसा था| यह बात और भी माइने रखती है कि उस भीड़ से बाहर निकालने वाला एक मुस्लिम भाई था| और जादा ख़ास बात हो जाती है क्योंकि वह लड़का महेज़ बीस बाईस के आसपास का था| इन कहानियों को सुनते व इनसे गुज़रते वक़्त तो नहीं पता था कि इस पर बुक लिखूंगी| इन तीनों घटनाओं को मर्ज़ करके और कुछ काल्पनिकता को जोड़ कर मैंने आज की स्थिति आपके सम्मुख रखी है|
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"नाम और जगह बदले हुए हैं| यदि नाम आपसे मेल भी खाते हैं तो भी आप यह जानते हैं कि कहानी आपकी नहीं हैं| कृपया किसी बात व घटना को अन्यथा ना लें तथा देश व समाज़ की बेहतरी के लिए अपने कर्तब्यों का सार्थक रूप से निर्वहन करें|
(1) जब मेरी उम्र कोई बारह साल रही होगी, उस टाइम मैं अक्सर अपने आस पड़ोस के लोगों से व अपने घर में एक बंदे के बारे में सुना करती थी| वह मुस्लिम था| दो चार बार मैंने उसे आते-जाते देखा भी था| दिखने में हट्टा कट्टा व खूबसूरत बंदा था| उस वक़्त उसकी उम्र कोई छब्बिस अठ्ठाइस के बीच रही होगी| वह मेरी बस्ती का तो नहीं था मगर उसे आसपास के लोग जानते थे| वह सिर झुका कर चलता था| तीन साल पहले जब हिन्दू-मुस्लिम मुझे बहुत सुनाई देने लगा, तब उसका ख़याल आया तो मैंने उसके बारे में सर्च की| तो पता चला कि वह बलात्कारियों से बहुत नफ़रत करता था| हालांकि अब वह कहाँ है, कोई नहीं जानता| वह बलात्कारियों को पकड़ता और अपने तरह से सज़ा देता|
(2) कुछ साल पहले मेरा एक कज़िन जब कॉलेज़ जाता था तो उसका एक फ्रेंड ग्रुप था, जिसमे सात लोग थे तथा कई धर्म व जाति के लोग थे| उसमे एक मुस्लिम लड़का था| इस टीम में एक लड़की भी थी| इस टीम की आपसी समझ, भिन्न जाति व भिन्न धर्म तथा कॉलेज़ के समय में भी समाज़ के लिए कई काम करना मुझे बहुत प्रभावित करता था| बहुत सकारात्मक उर्जा इस टीम से आती थी|
फिर मेरा कज़िन डेल्ही चला गया| कमाल की बात यह थी कि डेल्ही में भी उसके तीन ख़ास मित्र हुए जो अलग अलग कम्यूनिटी से थे| जब उसने एक बार डेल्ही वाले मित्रों को कॉलेज़ के मित्रों से मिलवाया, तो वह पार्टी मुझे कभी नहीं भूल सकती|
(3) इसी तरह मैं एक बार पब्लिक ट्रांसपोर्ट से मार्केट गई| दिन था पंद्रह अगस्त का| वापसी में भीड़ की वजह से मुझे कोई वाहन भी नहीं मिला और मैं करीब आधा किलो मीटर लम्बी भीड़ में फंस गई| यह देश के लिए आम जनों की रैली थी| खैर मैं किस तरह उस भीड़ में फंसी थी और क्या तकलीफ़ व कितनी भावनाएं आहत हुई थीं, यह चंद शब्दों में बयान करना मुमकिन नहीं| मगर एक भाई ने मुझसे पाँच गज दूर चलते हुए, रास्ता बनाते हुए वहाँ से मुझे बाहर निकाला| कहते हैं कि जिसके ऊपरसे मुसीबत गुज़रती है, वही जानता है| मेरे लिए उस वक़्त उस भीड़ से बाहर आना किसी बड़ी मुसीबत से बाहर आने जैसा था| यह बात और भी माइने रखती है कि उस भीड़ से बाहर निकालने वाला एक मुस्लिम भाई था| और जादा ख़ास बात हो जाती है क्योंकि वह लड़का महेज़ बीस बाईस के आसपास का था| इन कहानियों को सुनते व इनसे गुज़रते वक़्त तो नहीं पता था कि इस पर बुक लिखूंगी| इन तीनों घटनाओं को मर्ज़ करके और कुछ काल्पनिकता को जोड़ कर मैंने आज की स्थिति आपके सम्मुख रखी है|
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