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Caligula
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‘कालिगुला’ रोमन साम्राज्य के निरंकुश तानाशाह की मर्मांतक कहानी है जो अपने मारे जाने के षड्यंत्रों के बीच भी 'निर्भय' है। उसकी तानाशाही ने सदाचार को, ईमानदार आदमी को चाबुक पर नचाया है। उसे उन लोगों के चेहरों की मलिनता और गंध बड़ी निकृष्ट लगती है, जिन्होंने न दुःख भोगे न जोखिम उठाए, जो सद्गुणों की जैसे दुकान लगाते हैं, सुरक्षा का स्वप्न ऐसे देखते हैं जैसे कोई युवती प्रेम का। शायद ये इसी भय में अन्ततः मर भी जाएँगे बिना यह जाने कि उन्होंने जिन्दगी भर झूठ बोला है। ये लोग न्यायकर्ता कैसे हो सकते हैं?
ऐसी तमाम बातें, तमाम चीजें बेबाकी से सोचनेवाले निरंकुश, क्रूर और अनिष्टकारी कालिगुला को सारी वर्जनाओं के बावजूद किसी महानायक की तरह स्थापित करती चली जाती हैं। कालिगुला की मुक्ति की छटपटाहट और मनुष्य के मनोभावों पर निरपेक्ष पकड़ से ही उसके लिए चाँद जरूरी हो जाता है।
वह खुद से कहता है, ‘कालिगुला, तुम भी, तुम भी दंड के भागी हो। किसी से कुछ कम, किसी से कुछ ज्यादा लेकिन इस न्यायाधीशविहीन संसार में जहाँ कोई भी निर्दोष नहीं, कौन हिम्मत करेगा कि मुझे दोषी ठहराए?’
‘कालिगुला’ रोमन साम्राज्य के निरंकुश तानाशाह की मर्मांतक कहानी है जो अपने मारे जाने के षड्यंत्रों के बीच भी 'निर्भय' है। उसकी तानाशाही ने सदाचार को, ईमानदार आदमी को चाबुक पर नचाया है। उसे उन लोगों के चेहरों की मलिनता और गंध बड़ी निकृष्ट लगती है, जिन्होंने न दुःख भोगे न जोखिम उठाए, जो सद्गुणों की जैसे दुकान लगाते हैं, सुरक्षा का स्वप्न ऐसे देखते हैं जैसे कोई युवती प्रेम का। शायद ये इसी भय में अन्ततः मर भी जाएँगे बिना यह जाने कि उन्होंने जिन्दगी भर झूठ बोला है। ये लोग न्यायकर्ता कैसे हो सकते हैं?
ऐसी तमाम बातें, तमाम चीजें बेबाकी से सोचनेवाले निरंकुश, क्रूर और अनिष्टकारी कालिगुला को सारी वर्जनाओं के बावजूद किसी महानायक की तरह स्थापित करती चली जाती हैं। कालिगुला की मुक्ति की छटपटाहट और मनुष्य के मनोभावों पर निरपेक्ष पकड़ से ही उसके लिए चाँद जरूरी हो जाता है।
वह खुद से कहता है, ‘कालिगुला, तुम भी, तुम भी दंड के भागी हो। किसी से कुछ कम, किसी से कुछ ज्यादा लेकिन इस न्यायाधीशविहीन संसार में जहाँ कोई भी निर्दोष नहीं, कौन हिम्मत करेगा कि मुझे दोषी ठहराए?’

















