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Dharm Nirpekshta Banam Rashtriya Sanskriti
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Dharm Nirpekshta Banam Rashtriya Sanskriti
Current price: $4.99


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धर्मनिरपेक्षता बनाम राष्ट्रीय संस्कृति के अधिकतर निबन्ध समय, समाज साहित्य अर्थात् समग्र जीवन के वास्तविक सौन्दर्य के अन्वेषण में संलग्न हैं।
श्री राय भारतीय दर्शन, संस्कृति, साहित्य के प्रति भरपूर सम्मान भाव रखते हैं। देशबोध और मैथिली शरण गुप्त शीर्षक निबन्ध में वे देशबोध अर्थात् भारतबोध की अवधारणा प्रस्तुत करते हैं। यह बोध दम, त्याग और अप्रमाद पर आधारित है और कतई संकीर्ण नहीं है।
राजनीतिक मुद्दे हों, इतिहास के सवाल हों या साहित्य-विवेचन; इन सभी गम्भीर विषयों में श्री राय के बहु-पठित और गम्भीर विश्लेषक होने का प्रमाण मिलता है। भारत-बोध या देशप्रेम के आसपास विचरण करती उनकी चिन्तना अनेक पूर्वग्रहों का सतर्क उन्मूलन करती है। यह सत्य है कि धर्मनिरपेक्षता बनाम राष्ट्रीय संस्कृति के कई निबन्धों में वैचारिक गरिष्ठता अधिक है फिर भी मौलिक स्थापनाओं के चलते वे पठनीय बने रहते हैं। आज के संक्रमणशील यथार्थ और वैचारिक द्वन्द्व को समझने और वांछित सन्देश सम्प्रेषित करने में वे प्रासंगिक हैं। श्री राय के ये निबन्ध विस्मृति के आखेट बने रह जाते हैं। इन निबन्धों से असहमति की गुंजाइश कम नहीं है लेकिन श्री राय की अध्ययनशीलता, तर्कपूर्ण विश्लेषण, मौलिक वैचारिकता की उपेक्षा सम्भव नहीं है। श्री राय ने लोक साहित्य और संस्कृत वाङ्मय का बहुत सहारा न लेते हुए अपने ललित निबन्धों का जो विशेष मुहावरा गढ़ा था, वह इन रचनाओं में भी अपनी ऊर्जा और दीप्ति के साथ वर्तमान है।
डॉ. वेदप्रकाश 'अमिताभ'
धर्मनिरपेक्षता बनाम राष्ट्रीय संस्कृति के अधिकतर निबन्ध समय, समाज साहित्य अर्थात् समग्र जीवन के वास्तविक सौन्दर्य के अन्वेषण में संलग्न हैं।
श्री राय भारतीय दर्शन, संस्कृति, साहित्य के प्रति भरपूर सम्मान भाव रखते हैं। देशबोध और मैथिली शरण गुप्त शीर्षक निबन्ध में वे देशबोध अर्थात् भारतबोध की अवधारणा प्रस्तुत करते हैं। यह बोध दम, त्याग और अप्रमाद पर आधारित है और कतई संकीर्ण नहीं है।
राजनीतिक मुद्दे हों, इतिहास के सवाल हों या साहित्य-विवेचन; इन सभी गम्भीर विषयों में श्री राय के बहु-पठित और गम्भीर विश्लेषक होने का प्रमाण मिलता है। भारत-बोध या देशप्रेम के आसपास विचरण करती उनकी चिन्तना अनेक पूर्वग्रहों का सतर्क उन्मूलन करती है। यह सत्य है कि धर्मनिरपेक्षता बनाम राष्ट्रीय संस्कृति के कई निबन्धों में वैचारिक गरिष्ठता अधिक है फिर भी मौलिक स्थापनाओं के चलते वे पठनीय बने रहते हैं। आज के संक्रमणशील यथार्थ और वैचारिक द्वन्द्व को समझने और वांछित सन्देश सम्प्रेषित करने में वे प्रासंगिक हैं। श्री राय के ये निबन्ध विस्मृति के आखेट बने रह जाते हैं। इन निबन्धों से असहमति की गुंजाइश कम नहीं है लेकिन श्री राय की अध्ययनशीलता, तर्कपूर्ण विश्लेषण, मौलिक वैचारिकता की उपेक्षा सम्भव नहीं है। श्री राय ने लोक साहित्य और संस्कृत वाङ्मय का बहुत सहारा न लेते हुए अपने ललित निबन्धों का जो विशेष मुहावरा गढ़ा था, वह इन रचनाओं में भी अपनी ऊर्जा और दीप्ति के साथ वर्तमान है।
डॉ. वेदप्रकाश 'अमिताभ'


















